जन्मदिन का उपहार

युवा कहानीकार – अनिकेत गुप्त

सुबह से घर में बहस चल रही है। मैंने भी ठान लिया था कि इस बार मुझे अपनी कोई राय नहीं देनी है। पापा का कहना है कि दान हमलोग गौशाला में ही करेंगे जबकि मम्मी मंदिर के लिए कह रही है। पिछले 10 साल से हमारे घर का नियम-सा बन गया था। मेरे जन्मदिन पर हम पार्टी न करके हम उन रुपए को किसी धर्मस्थल पर दान कर देते थे। यह सिलसिला काफी लंबे समय से चला आ रहा है। दो दिन बाद ही मेरा जन्मदिन आ रहा है। इस बार भी हर बार की तरह हमें रुपए को दान में देना है। यूं तो हर साल हम मंदिर में ही चढ़ावा चढ़ाते थे, पर पता नहीं क्यूं पापा गौशाला की जिद पकड़े हुए हैं।
“ये जिद उस व्यास भाईसाहब के कारण है ना, सब समझती हूं। वो अपने गौशाला में ये पैसा लेना चाहते हैं लेकिन मैं कह देती हूं, चोलबे ना। आपने जो चाही, चोलबे ना।” मम्मी ने गुस्से में जब बांग्ला में बोला तो पापा हंसने लगे … ।

“तुम बांग्ला बोल के मुझे डरा नहीं सकती हो। आमी न चोलबे too” पापा के इस टूटे-फूटे बांग्ला को सुनकर मुझे भी हंसी आ गई।
मम्मी भी हंसने लगी। फिर बोली “बात को मजाक में मत उड़ाओ, एक काम करते है आधे रुपए मंदिर में और आधे गौशाला में दान कर देते है।” मम्मी ने मामले को सुलझता न देखकर अंतिम उपाय रखा।
इससे पहले की पापा मम्मी के उपाय का कुछ जवाब देते मैं बीच में बोल उठा।
“मैं कुछ बोलूं, वैसे भी मेरा जन्मदिन है तो इस बार मैं कुछ और चाहता हूं।”

“बताओ क्या आदेश है हमारे लिए। क्या चाहिए हमारे बेटे को इस बार” पापा ने मेरा हाथ पकड़ते हुए मेरी तरफ मुस्कुराकर कहा।
“पापा, पिछले तीन महीने से मैं जो सुबह की ट्यूशन और रात की एक्स्ट्रा क्लासेज कर रहा हूं, दरअसल मैं पार्ट टाइम जॉब कर रहा हूं। मैं अपने अठारवें जन्मदिन पर कुछ पैसे बचाना चाह रहा था। मेरी तीन महीनों की बचत और गुल्लक के पैसे मिलाकर करीब बीस हजार हो चुके हैं। आप जो सत्तर हजार दान करना चाह रहे हैं, दोनों मिलाकर नब्बे हजार हो जाएंगे। मेरे एक दोस्त को अपने नए बिजनेस के लिए एक लाख रुपए चाहिए, क्यूं ना ये पैसे हम अभी उसे दे दे। जब भी वो सक्षम होगा तब ये पैसे हमें ब्याज सहित लौटा देगा। हम उस समय ये सारा पैसा मंदिर या गौशाला में दान कर देंगे।” कहकर मैं सर झुकाकर खड़ा हो गया।

पापा और मम्मी निस्तब्ध खड़े थे। अचानक से मम्मी ने मुझे गले लगा लिया, “ओ मेरा शोना, खूब भालो बेटा। यहीं करेंगे हम सब। सुन लो जी, अब यही फाइनल है। इससे अच्छा जन्मदिन का तोहफा कुछ हो ही नहीं सकता है और हां, अब नब्बे हजार नहीं बल्कि पूरे एक लाख देंगे। 10 हजार मेरी तरफ से भी।” कहते हुए मम्मी मुस्कुराने लगी। उनकी आंखें गीली हो चुकी थी।
“जैसा आप दोनों आदेश करें।” कहकर पापा ने मुझे गले लगा लिया।

“वैसे आपका ये दोस्त कौन है और कौन सा बिजनस करना चाह रहा है, मैं जानना चाहूंगा।”
“पापा, ये अपनी बाई सा के बेटे रोहन भैया के लिए है। बाई सा शुरू से ही हमारे घर के लिए काम कर रही है, क्या हम उनके लिए इतनी छोटी सी चीज नहीं कर सकते हैं।”
“बिलकुल कर सकते हैं बेटा जी, आज ही रोहन को मेरे पास भेज देना। मैं चेक उसे दे दूंगा।”
मैं खुशी से झूम उठा था, वैसे तो मेरा जन्मदिन दो दिन बाद था लेकिन मेरा गिफ्ट मुझे आज ही मिल चुका था।

(शेखपुरा, बिहार के रहने वाले अनिकेत गुप्त इन दिनों जोधपुर, राजस्थान में रहते हैं। उनसे संपर्क करने का एक माध्यम ये भी https://www.facebook.com/guptaniket)

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