इतिहास पर मुकेश बरनवाल की दो पुस्तकों का विमोचन

दिल्ली के कटवरियासराय स्थित श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के सभागार में 11 अगस्त, 2018 को श्री मुकेश बरनवाल द्वारा भारतीय इतिहास पर लिखी दो पुस्तकों का विमोचन का हुआ। पुस्तकों का नाम ‘पाषाण काल से आजादी तक’ और ‘भारत का राष्ट्रीय आंदोलन’ है। दो पुस्तकों का विमोचन कार्यक्रम संवर्धन ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित हुआ। पुस्तकों का विमोचन दिल्ली विश्वविद्यालय तथा अन्य संस्थानों से आए प्रोफेसर और विद्वजनों के हाथों संपन्न हुआ।  Continue reading “इतिहास पर मुकेश बरनवाल की दो पुस्तकों का विमोचन”

गजल – अफसानों की उल्फत

जमीं पर पैर नहीं या पैरों तले जमीं नहीं।
वो आसमां में उड़े तो इसका ख्याल नहीं।।

टूटते दरख्तों की जानिब किया जो खबर।
उस बेखबर बेवफा को इसका मलाल नहीं।।

गुलजार है उनका अफसानों की उल्फत।
ऐसे में गुजारे उम्र होंगे ऐसे हलाल नहीं।।

लूटा दूंगा बज्म-ए-दिल शाम-ए-महफिल।
सहन कर सकते हैं बांके का जलाल नहीं।।

– दीपक राजा
15 जुलाई, 2018
नई दिल्ली

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अगर आप रिश्तों के प्रति संजीदा हैं और रचनाएं करते हैं तो आप हो सकते हैं पुस्तक प्रकाशन योजना में शामिल

अगर आप खून के रिश्ते, पारिवारिक रिश्ते और सामाजिक रिश्ते को लेकर संजीदा हैं और रिश्तों पर आधारित अपनी भावनाओं को शब्द में पिरोना जानते हैं तो यह खबर आपके लिए है। आप कविता, कहानी या किसी भी विधा में साहित्यिक रचना करते हैं तो यह खबर आपको पुस्तक का हिस्सा बनने का एक अवसर बनकर आया है। Diparti Welfare Foundation (DWF) आपके लिए पुस्तक प्रकाशन की योजना लेकर आया है। DWF की योजना में आप अपनी रचना भेजकर प्रकाशित होने वाली पुस्तक का हिस्सा बना सकते हैं।

पुस्तक प्रकाशन की योजना के तहत रचनाएं आमंत्रित
अखिल भारतीय स्तर पर काम करने की इच्छा रखने वाला संगठन – Diparti Welfare Foundation (DWF), पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को संजोना चाहता है। उन रिश्तों की भावनाओं और संवेदनाओं को एक आकार देना चाहता है। रिश्तों पर लिखी जा रही रचनाओं को एक सूत्र में पिरोना चाहता है। इसके लिए DWF पुस्तक प्रकाशन की योजना लेकर आपके बीच आया है।

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उम्मीद का दीया

नोट – वाट्सअप से स्टोरी मिली। अच्छी है। इसके जो भी रचनाकार हैं, उनको साधुवाद। प्रेरक लिखने वाले का कोई नाम बता सकें तो उन्हें इस कहानी के लिए क्रेडिट जरूर देंगे। – संपादक

एक घर मे पांच दिए जल रहे थे। Continue reading “उम्मीद का दीया”

जन्मदिन का उपहार

युवा कहानीकार – अनिकेत गुप्त

सुबह से घर में बहस चल रही है। मैंने भी ठान लिया था कि इस बार मुझे अपनी कोई राय नहीं देनी है। पापा का कहना है कि दान हमलोग गौशाला में ही करेंगे जबकि मम्मी मंदिर के लिए कह रही है। पिछले 10 साल से हमारे घर का नियम-सा बन गया था। मेरे जन्मदिन पर हम पार्टी न करके हम उन रुपए को किसी धर्मस्थल पर दान कर देते थे। यह सिलसिला काफी लंबे समय से चला आ रहा है। दो दिन बाद ही मेरा जन्मदिन आ रहा है। इस बार भी हर बार की तरह हमें रुपए को दान में देना है। यूं तो हर साल हम मंदिर में ही चढ़ावा चढ़ाते थे, पर पता नहीं क्यूं पापा गौशाला की जिद पकड़े हुए हैं। Continue reading “जन्मदिन का उपहार”

आसान नहीं है बदलाव

प्रियंका बरनवाल, लेखिका

समाज में अगर किसी तरह के सुधार की जरूरत है तो बदलाव करना ही पड़ता है। बदलाव ही ऐसी वो चाबी है जो गहरे से गहरे जड़ों में दबी छोटी से छोटी मानसिकता को भी बदल सकती है। बदलाव के माध्यम से शिकायतों को भी दूर कर किया जा सकता है। मगर क्या बदलाव आसान है? नहीं। आसान होता तो आज शायद मैं और आप इस विषय पर गंभीर चर्चा नहीं कर रहे होते। तो चलिए जानते हैं क्यों मुश्किल है बदलाव? Continue reading “आसान नहीं है बदलाव”

दिसंबर-जनवरी के हस्तांतरण काल में ये कैसा नव वर्ष

कुछ मित्र अभी से नव वर्ष की अग्रिम शुभकामना देने की प्रक्रिया में तल्लीन हो गये हैं। ऐसे में, हमें राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ” दिनकर ” की कविता याद आती है। वह कविता शब्दश: यहां Continue reading “दिसंबर-जनवरी के हस्तांतरण काल में ये कैसा नव वर्ष”