गजल – अफसानों की उल्फत

जमीं पर पैर नहीं या पैरों तले जमीं नहीं।
वो आसमां में उड़े तो इसका ख्याल नहीं।।

टूटते दरख्तों की जानिब किया जो खबर।
उस बेखबर बेवफा को इसका मलाल नहीं।।

गुलजार है उनका अफसानों की उल्फत।
ऐसे में गुजारे उम्र होंगे ऐसे हलाल नहीं।।

लूटा दूंगा बज्म-ए-दिल शाम-ए-महफिल।
सहन कर सकते हैं बांके का जलाल नहीं।।

– दीपक राजा
15 जुलाई, 2018
नई दिल्ली

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अगर आप रिश्तों के प्रति संजीदा हैं और रचनाएं करते हैं तो आप हो सकते हैं पुस्तक प्रकाशन योजना में शामिल

अगर आप खून के रिश्ते, पारिवारिक रिश्ते और सामाजिक रिश्ते को लेकर संजीदा हैं और रिश्तों पर आधारित अपनी भावनाओं को शब्द में पिरोना जानते हैं तो यह खबर आपके लिए है। आप कविता, कहानी या किसी भी विधा में साहित्यिक रचना करते हैं तो यह खबर आपको पुस्तक का हिस्सा बनने का एक अवसर बनकर आया है। Diparti Welfare Foundation (DWF) आपके लिए पुस्तक प्रकाशन की योजना लेकर आया है। DWF की योजना में आप अपनी रचना भेजकर प्रकाशित होने वाली पुस्तक का हिस्सा बना सकते हैं।

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