आसान नहीं है बदलाव

प्रियंका बरनवाल, लेखिका

समाज में अगर किसी तरह के सुधार की जरूरत है तो बदलाव करना ही पड़ता है। बदलाव ही ऐसी वो चाबी है जो गहरे से गहरे जड़ों में दबी छोटी से छोटी मानसिकता को भी बदल सकती है। बदलाव के माध्यम से शिकायतों को भी दूर कर किया जा सकता है। मगर क्या बदलाव आसान है? नहीं। आसान होता तो आज शायद मैं और आप इस विषय पर गंभीर चर्चा नहीं कर रहे होते। तो चलिए जानते हैं क्यों मुश्किल है बदलाव?

नजरिया अपना अपना

मेरे मोबाइल पर आए व्हाट्सएप ग्रुप पर आये एक सरल संदेश की बात करते हैं। उसमें बताया गया था कि पत्नी चाहे दिनभर कितना भी काम कर ले, जब तक पति की सराहना नहीं मिलती, बेकार है। पति की सराहना उसके काम का औचित्य साबित करता है, ऐसा उस संदेश का अर्थ था। अब ये भला वही बात हो गयी कि जब हम पेड़ की सराहना करेंगे तभी फल-फूल देगा, यह सोच ठीक नहीं है। हम पेड़ की सराहना करें या न करें, उसे अपना काम करना ही है और इसके लिए वह प्रशंसा के दो बोल पर आश्रित नहीं है। हां। अगर उस संदेश में ये कहा जाता कि पत्नी और पति दोनों के काम बराबर हैं और उनका बराबर महत्व है, तब कुछ और ही बात होती। किसी की सराहना करने से अंजाम का महत्व बढ़ता या घटता नहीं है। सिर्फ हम उस काम को कितने दिल पूरा करते हैं, ये उसके अंजाम का औचित्य साबित करता है।

शिक्षा का दायरा

शिक्षा हमारे विकास का मापदंड है, इसमें तो कोई दो राय नहीं। शिक्षा हमारी सोच के दायरे को विस्तार देता है। और तो और शिक्षा ही एक ऐसी इकाई है जो हमें मुश्किल के समय में सही सोच रखने, सही दिशा तय करने और धैर्य को बरकरार की सीख देता है। तो आप कह सकते हैं कि बदलाव लाने के लिए शिक्षित होना बेहद अनिवार्य है। शिक्षा के अभाव में हमारी सोच उम्दा नहीं हो पाती। बहुत मेहनत करने पर भी हमारे गुणों का सही मूल्यांकन नहीं हो पाता। और इस वजह से हम समाज के विकास में कोई योगदान नहीं कर पाते।

आत्म-विश्वास की कमी

ब्लेक लिवली ने क्या खूब कहा है – अगर आप सबसे खूबसूरत कुछ पहन सकते हैं तो वो है आत्म-विश्वास। कितनी सटीक बात है। अगर आत्म-विश्वास नहीं होता तो आज हमारा भारत देश अंग्रेजों के चंगुल से स्वतंत्र नहीं होता। आत्म-विश्वास ही ऐसा शस्त्र था जिसने रानी लक्ष्मीबाई को अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने को मैदान-ए-जंग में उतार दिया। ये आत्म-विश्वास का ही कमाल था, जिसने स्टीव जॉब्स को उन्ही की बनाई कंपनी ‘एप्पल’ से निकाल देने के बावजूद अतुलनीय सफलता से साक्षात्कार कराया।

कितनी ही बार जब मैं कोई नया काम करने की सोचती हूं तो मन में एक बार ये अवश्य आता है कि क्या मैं इसे कर पाऊंगी? क्या मेरे अंदर वो बात है जो मुझे सफलता की ऊंचाई तक ले जायेगा? फिर अगले ही पल मैं हिम्मत से काम लेती हूं और अपने काम को पूरे दिल से करने लग जाती हूं। स्वयं की योग्यता और कर्मठता पर संदेह करके कभी भी कोई अपने वांछित काम को सफलता पूर्वक नहीं कर पाएगा। और अगर खुद पर भरोसा है तो पहाड़ नदियां क्या हम मंगल ग्रह पर भी दुनिया की सबसे सस्ती सैटेलाइट बनाकर भेज सकते हैं। अपने आस-पास देखिये और आप आत्म-विश्वास से रंजित कई उदाहरण पाएंगे। स्वयं आप भी एक हो सकते हैं। बस थोड़े से आत्म-विश्वास की आवश्यकता है।

नकारात्मक सोच

आपने कहा कि आज मैं वोट डालने जा रहा हूं। बस इसी बात पर आपके दोस्त को हंसी आ गयी। कहने लगा, ‘अरे! वोट डालने से कुछ नहीं होता। सरकार चाहे कोई भी बने, हमारी स्थिति ऐसी ही रहेगी।’लीजिये! अभी तो सर मुंडाने चले ही थे कि ओले पड़ने लगे। आप आगे भी बढ़ना चाहेंगे तो दूसरों की ऐसी नकारात्मक सोच पीछे की तरफ खींचती है। अगर हमें बदलाव चाहिए तो हमें कदम उठाना ही पड़ेगा। बिना कुछ किये हमने कैसे मान लिया कि कुछ नहीं हो सकता? या नयी सरकार हमारे अच्छे के लिए कुछ नहीं करेगी? जनाब हो या मोहतरमा! ज़रा सोच बदलिए, देश भी बदल जायेगा।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता

जमाना अब काफी बदल चुका है और बदल भी रहा है। विज्ञान की तरक्की की वजह से आज कितने ही भ्रम व मिथ्या आदि का अंत हो चुका है। आज हम अपने वातावरण की सुरक्षा कर सकते हैं। विज्ञान हमें आने वाले खतरनाक आपदाओं से सजग कर करता है। विज्ञान का ही कमाल है मोबाइल और इंटरनेट। इसके द्वारा हम दुनिया के किसी भी कोने में बैठे इंसान से जुड़ सकते हैं। और तो और, विज्ञान की ही वजह से आज हम अपने विचारों का आदान – प्रदान बरन पुंज जैसे बदलाव लाने के बाध्य प्रकाशन के इस लेख से कर सकने में सक्षम हैं। बस थोड़ा सा दृष्टिकोण की सीमा बढ़ाने की ज़रुरत हैं।

 

क्या करें मुश्किल को आसान बनाने के लिए ?

  • आस पास की अच्छी बातों का अनुभव लीजिये। आस-पास विकास या बदलाव हो रहा है, उस पर ध्यान देकर हम अपना योगदान दे सकते हैं।
  • अगर किसी की अलग सोच आपकी सोच से मेल नहीं खाती तो बेहतर होगा आप उनकी विचारधारा से खुद को परिचित कराएं। ऐसा करने से दो बातें होंगी – एक तो आपका एक नयी सोच से साक्षात्कार होगा, और दूसरा, क्या पता एक नया दोस्त ही बन जाए विचारों के आदान-प्रदान से।
  • अंजाम की चिंता छोड़ कर कर्म पर ध्यान दें। अक्सर हम अंजाम की चिंता में घुल कर अपने काम को सही आगाज़ नहीं दे पाते। अब भला जो हमारे हाथ में नहीं है, उसे सोच कर क्या फायदा ? कर्म करना हमारे हाथ में है तो अगर बदलाव लाना है तो अंजाम से ज़्यादा कर्म पर ध्यान और यकीन करना होगा।
  • किसी संगठन का हिस्सा बनिए। ऐसा करने से आप कितने ऐसे लोगों से मिल सकेंगे जो अपने देश अपने समाज के लिए कुछ नया और बेहतर कर गुजरने को ऊर्जावान हैं। ऐसे लोगों से मिलने से आपके अंदर भी सकारात्मक सोच का सूरज उदय होगा और आप भी बदलाव का हिस्सा बन सकेंगे।
  • किताबें पढ़िए। मैं खुद एक लेखिका हूं और साथ ही साथ किताबें भी पढ़ने का बहुत शौक रखती हूं। अपने पिता से ये गुण मिला है मुझे। किताबें पढ़ने से आपकी सोच का दायरा बहुत बढ़ जाता है। किताबों में कितनी ही ऐसी जानकारी और कहानियां छिपी हैं जो हमें अक्सर ही काम आ जाती हैं। यूं ही नहीं कहा गया है कि किताबें ही मनुष्य की सबसे अच्छी दोस्त हैं। मुझे कहने में गर्व है कि किताबें मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं।
  • मदद लीजिये। अगर आप की बदलाव लाना चाहते हैं मगर लगता है आपके अकेले की बस की बात नहीं तो आप सरकार की मदद ले सकते हैं। मैंने अपने मोबाइल में हमारे प्रधानमंत्री जी द्वारा निर्मित और संचालित ऐप डाउनलोड किया है – नरेंद्र मोदी ऐप। इस ऐप के द्वारा आप मोदी जी की गतिविधियों की जानकारी हासिल कर सकते हैं। उनके प्रचलित ‘मन की बात’ के प्रकरण भी सुन सकते हैं। सबसे अच्छी बात ये हैं इस ऐप की कि आप अपने प्रधानमंत्री से संपर्क भी कर सकते हैं। चाहे कोई समस्या हो, प्रशंसा के दो शब्द, आलोचना या मदद की गुहार, इस ऐप के ज़रिये आप बदलाव लाने की मुहीम चला सकते हैं।
  • काम बताइये, बहाने नहीं। आप बदलाव तो लाना चाहते हैं मगर हे राम! घर और दूकान की रोज़मर्रा की आराम की ज़िन्दगी से पीछा ही नहीं छूटता। ‘समय ही नहीं मिलता है’, ‘कल पक्का!’, ‘आज सर दर्द है। पौधे लगाने कल चलेंगे’ जैसे अनगिनत बहाने सुनने को मिल ही जाते हैं। अंजाम? ज़िन्दगी जैसी कल थी आज भी वैसी ही है। ना ही कोई बदलाव ना ही कोई इसके आसार। तो बहाने नहीं काम बताइये कि कितने किये हैं आपने।
  • अपने देश से प्यार करें। विदेश अच्छा है मगर हमारा देश सबसे खूबसूरत है। अगर आप इसे अपने घर की तरह समझेंगे तो इसकी रंगाई-पुताई और साफ-सफाई पर ध्यान भी देंगे। मेहमान का स्वागत भी दिल से करेंगे। इसकी अच्छाइयों के साथ साथ कमियों को भी दिल से अपनाएंगे और अगर ऐसा होगा तो भला कौन सा ऐसा देश है जहाँ आप बदलाव का कारण नहीं बनेंगे? ज़रूर बनेंगे।

याद रखिये – शुरुआत हमेशा खुद से ही होती है।

(लेखिका की दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अक्सर अंग्रेजी में लिखने वाली प्रियंका बरनवाल जी से हिन्दी में लिखने का आग्रह किया और वह इसके लिए सहज तैयार हुई। हमारी टीम उनकी लेखनी के लिए आभार व्यक्त करती है।)

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