उम्मीद का दीया

नोट – वाट्सअप से स्टोरी मिली। अच्छी है। इसके जो भी रचनाकार हैं, उनको साधुवाद। प्रेरक लिखने वाले का कोई नाम बता सकें तो उन्हें इस कहानी के लिए क्रेडिट जरूर देंगे। – संपादक

एक घर मे पांच दिए जल रहे थे।

एक दिन पहले दिए ने कहा – ‘इतना जलकर भी मेरी रोशनी की लोग इज्जत नहीं करते हैं। इससे तो बेहतर है कि मैं बुझ ही जाऊ ‘ और वह दीया खुद को व्यर्थ समझ कर बुझ गया। जानते है वह दिया कौन था? वह दीया था ‘उत्साह’ का प्रतीक।

यह देख दूसरा दीया जो ‘शांति’ का प्रतीक था, कहने लगा, मुझे भी बुझ जाना चाहिए… । निरंतर शांति की रोशनी देने के बावजूद लोग हिंसा करना तो छोड़ नहीं रहे हैं। …और शांति का दीया बुझ गया।

उत्साह और शांति के दीये बुझने के बाद, जो तीसरा दीया ‘हिम्मत’ का था, वह भी अपनी हिम्मत खो बैठा और बुझ गया।

उत्साह, शांति और अब हिम्मत के न रहने पर चौथे दीए ने बुझना ही उचित समझा। चौथा दीया ‘समृद्धि’ का प्रतीक था। सभी दीए बुझने के बाद केवल पांचवां दीया अकेला ही जल रहा था।

हालांकि पांचवां दीया सबसे छोटा था। फिर भी, वह निरंतर जल रहा था। तब उस घर में एक लड़के ने प्रवेश किया। उसने देखा कि उस घर में सिर्फ एक दीया जल रहा है। वह खुशी से झूम उठा। चार दीए बुझने की वजह से वह दुखी नहीं हुआ बल्कि खुश हुआ, यह सोचकर कि कम से कम एक दीया तो जल रहा है। घर में रोशनी आ रही है। घर अंधेरे में नहीं है। फिर भी उसने तुरंत एक काम किया। उसने पांचवें जलते दीये को उठाया और बाकी के चार दीए को फिर से जला दिया। इसके साथ ही एक बार फिर घर में पांचों दीये जगमगाने लगे।

जानते हैं वह पांचवां अनोखा दीया कौन-सा था? वह था ‘उम्मीद’ का दीया …।

प्रेरणा – इसलिए अपने घर में, मन में, जीवन में सदैव उम्मीद का दीया जलाए रखिये। चाहे सब दीए बुझ जाए लेकिन उम्मीद का दीया नहीं बुझना चाहिए। ये एक ही दीया काफी है बाकी सब दीयों को फिर जलाने के लिए …। क्योंकि जहां उम्मीद जगती है वहीं हमारे भविष्य के निर्माण की शुरुआत है।

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