सान्वी उर्फ विद्या दिखा रही है ‘जीने की नई राह’

बिहार का सीवान जिला देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, महाठग नटवरलाल या फिर सजायाफ्ता नेता व पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन के नाम से भी जाना जाता है। चर्चित तेजाब कांड के न्याय के लिए संघर्षरत चंदा बाबू की गाथा और उनकी जीवटता के कारण भी सीवान लोगों की जुबान पर है। इन दिनों सीवान एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। चर्चा का कारण एक ग्यारह साल की बच्ची है सान्वी जिसे बच्चे प्यार से ‘विद्या दीदी’ कहते हैं। सान्वी ने खेलने की उम्र में, वह करने की ठानी है, जिसकी कल्पना कोई भी इस उम्र में नहीं करता है। नन्हीं समाजसेविका सान्वी उर्फ विद्या के ‘ज्ञान दान’ का यज्ञ कर रही है और अपना जीवन इसके लिए आहूत कर रही है।

आंखों से दिव्यांग सान्वी सिर्फ ग्यारह वर्ष की है और पांचवीं कक्षा की छात्रा है। वह पिछले दो साल से अपने से छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ना लिखना सीखा रही है। किसके साथ किस तरह बात करना चाहिए, यह संस्कार बच्चों में देने का प्रयास कर रही है। सीवान के गुठनी प्रखंड के छोटे से गांव मझवलिया में रहने वाली सान्वी नानी के पास रहती है।

स्वच्छ और शिक्षित समाज में रहना है तो हमें ही समाज की कुरीतियों और गंदगियों को समाप्त करने का बीड़ा उठाना पड़ेगा। कहना जितना आसान है, उसके लिए जुटना उतना ही मुश्किल लेकिन सान्वी के लिए यह दिनचर्चा बन गया है। वह रोजाना स्कूल से आने के बाद अपने से कम उम्र के बच्चों को खुले आसमान के नीचे कुरीतियों और अज्ञानता के अंधकार को दूर करने के लिए ज्ञान की ज्योत को अपनी मेहनत और लगन से तेज और तेज कर रही है। प्रतिभा की धनी सान्वी एक वक्त में मौखिक और लिखित दोनों काम कर लेती हैं। वह आस-पड़ोस के पांचवीं तक के करीब 40 बच्चों को प्रतिदिन पढ़ाती है।

साभार- नारद मीडिया

वर्ष 2015 से शुरू किया अभियान
सान्वी का कहना है कि वह जब स्कूल से पढ़कर घर लौटती थी तो यहां के बच्चों को आपस में काफी गन्दी-गन्दी गालियां देते हुए सुनती थी। इनकी बातों को सुनकर उसके मन में यह ख्याल आया कि इन सबको शिक्षा और संस्कार देने की कोशिश करनी चाहिए। इसके बाद सान्वी ने स्वत: ही बच्चों को वर्ष 2015 से पढ़ाना शुरू कर दिया। स्वयं बहुत सुविधा प्राप्त नहीं होने के बाद भी सान्वी यह काम सेवाभाव से करती है।

बच्चों को पढ़ाती सान्वी
नानी और छोटी बहन परी के साथ सान्वी

जन्म से दिव्यांग है सान्वी
मझवालिया के भीम की नातिन और सीमा बर्णवाल की बेटी सान्वी जन्म के समय ही आंख से दिव्यांग पैदा हुई थी। नाना भीम बताते हैं कि जन्म से ही सान्वी की आंख में रौशनी नहीं थी। हालांकि, मात्र पांच माह की उम्र से ही दिल्ली के एम्स में इलाज कराने के बाद अब सान्वी को चश्मा के सहारे थोड़ा दिखने लगा है।

मां भी सहयोगी
सान्वी मां सीमा पास के ही प्रखंड में ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। वह कहती हैं कि सान्वी की इस पहल से काफी खुश हैं और जितना हो सकता है वह उसका सहयोग करती हैं।

सान्वी पर बरनवाल समाज को गर्व
सान्वी मात्र 11 साल की उम्र में समाज को एक नई दिशा देने का प्रयास कर रही है, वह वाकई काबिले तारीफ है। बच्चों की विद्या दीदी बनीं नन्हीं समाजसेविका सान्वी पर बरनवाल समाज को गर्व है। सान्वी बच्चों का सकारात्मक शैक्षणिक विकास करना ही अपना लक्ष्य मानती है। सान्वी के लक्ष्यपूर्ति में बरनवाल समाज अग्रणी भूमिका निभाएगा। हमें सान्वी नई राह दिखा रही है। हमें सान्वी से प्रेरणा लेने की जरूरत है।

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