#MeeToo के दौर में भोगे हुए यथार्थ की सच्चाई है ‘ताल ठोक के’

समीक्षक – दीपक राजा

स्त्री विमर्श के नाम पर बहुत-सी पुस्तकें, लेख, कहानी और कविताओं को मैंने समझने का प्रयास किया लेकिन ‘ताल ठोक के’ पुस्तक अपने शीर्षक के अनुसार ही डंके की चोट पर औरत की वास्तविक स्थिति से रू-ब-रू कराती है। पुस्तक की कविताएं एक ऐसे अहसास से परिचय कराती है जिससे हम रोजाना अपनी जिंदगी में दो-चार होते हैं। Continue reading “#MeeToo के दौर में भोगे हुए यथार्थ की सच्चाई है ‘ताल ठोक के’”