सच्ची सुंदरता

सुंदरता मुख्य रूप से दो प्रकार की कही जा सकती है – आंतरिक सुंदरता और बाह्य सुंदरता अर्थात् मन की सुंदरता और तन की सुंदरता। जब हम कहते हैं कि अमुक व्यक्ति का मन अतिसुंदर है, तो इसका अभिप्राय है कि परोपकार, करुणा, दया आदि मानवीय गुणों से वह व्यक्ति परिपूर्ण है। किन्तु जब हम किसी व्यक्ति के विषय में यह कहते हैं कि देखो, वह व्यक्ति कितना सुंदर दिखाई दे रहा हैं, तो इसका मतलब है कि शारीरिक सौष्ठव, रंग-रूप की दृष्टि से वह व्यक्ति आकषर्ण का केंद्र है। 

इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति सुंदर और आकर्षक दिखना चाहता है। किन्तु, मैं तो समझता हूं कि इस संसार में सभी सुंदर हैं। कौन सुंदर है और कौन सुंदर नहीं है। इसके बीच में कोई रेखा खींचना एक दुश्कर कार्य है। सभी सुंदर हैं,सभी आर्कषक हैं। यह तो व्यक्ति विशेष की सोच और भावनाओं पर निर्भर करता है। एक शिल्पकार जो मूर्तियां गढ़ता है, वह कोशिश करता है कि उसकी बनाई हुई मूर्ति अधिक-से-अधिक सुंदर और आर्कषक दिखे। जब एक सामान्य शिल्पकार के मन में यह भावना होती है, तो फिर उस महान शिल्पकार, जिसे हम ईश्वर, भगवान, खुदा और अन्य नामों से अभिहित करते हैं, के मन में भी निश्चित रूप से यह भावना रहती होगी कि उसकी सर्जना/कृति/रचना अनुपम और सुंदर हो, इसलिए सुंदर और सुंदर नहीं के बीच रेखा खींचकर इन्हें परिभाषित करना कठिन ही नहीं अनुचित भी है।

सुंदरता का कोई मापदंड नहीं है। हो सकता है कि कोई व्यक्ति बाह्य दृष्टि से अतिसुंदर और आर्कषक हो, किन्तु उसके मन में दूसरों के प्रति परोपकार और दया का भाव लेशमात्र न हो, तो क्या उसे सुंदर कहा जाएगा। नहीं, कदापि नहीं। इसके विपरीत, वह व्यक्ति जो देखने में सांवला और अनाकर्षक है, किन्तु दूसरों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहता है, उसे ही सुंदर माना जाएगा। इसे हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि बाह्य या शारीरिक सुंदरता व्यक्तिपरक है और आंतरिक सुंदरता में सामाजिकता निहित है। जब हम स्वार्थपरता, क्रूरता, घृणा आदि पर विचार करते हैं, तो हमारे सामने कुरूपता का चित्र खिंच जाता है किन्तु जब प्रेम, परोपकार, दया आदि सोचते हैं तो हमारी आंखें सुंदरता से खिल जाती है। हम किसी पुरुष या नारी के इन्हीं गुणों पर रीझते हैं और तब वह हमारे लिए प्रियदर्शी और आर्कषक बन जाता है। निष्कर्ष यह है कि समाजशास्त्र के अनुसार आंतरिक सुंदरता वाले व्यक्ति को ही सामाजिक प्राणी कहा जा सकता है।

आज पुरुष हो या नारी, सभी स्वयं को सुंदर और आकर्षक दिखने के लिए तरह-तरह के साधनों-प्रसाधनों का उपयोग करते हैं। स्वयं को आकर्षक प्रस्तुत करना, कोई अनुचित कार्य नहीं है। यह तो मानवजनित स्वभाव है। हमारा तो केवल मंतव्य है कि बाह्य सौंदर्य के साथ-साथ हम अपने आंतरिक सुंदरता को भी पल्लवित करें,विकसित करें और एक सामाजिक प्राणी होने का अधिकारी बनें।
अब, हम एक तीसरे सौंदर्य की बात करते हैं-नैसर्गिक अथवा प्राकृतिक सौंदर्य। ऊंचे-ऊंचे पहाड़, बर्फ से ढकी हुई पर्वतों की चोटियां,हरी-भरी घाटियां, कल-कल निनाद करती नदियां, ये सभी कितने सुंदर और मनोहारी लगते हैं।यह तो इन्हें प्रत्यक्ष देखने के बाद ही अनुभव होता है। क्या आपने कभी सागर की लहरों से सुदूर किसी नौका को अठखेलियां करते हुए देखा है? यदि नहीं, तो कभी यदि अवसर मिले, तो इसका दिग्दर्शन अवश्य करें। मन को यह दृश्य मुग्ध कर देगा। कभी आपने फूलों की घाटी की सैर की है। असीम सौंदर्य का दर्शन मिलेगा। प्रकृति में चारों ओर सौंदर्य ही सौंदर्य बिखरा पड़ा है। देखने वाली आंखें चाहिए।

आज इंसान विभिन्न प्रकार के प्रसाधनों का इस्तेमाल करके खुद को अधिक से अधिक सुंदर बनाने में लगा हुआ है। किन्तु खूबसूरती कोई बाजार में बिकती हुई चीज नहीं है जो खरीदी जा सके। रुपए पैसे से खरीदी गई सुंदरता कृत्रिम या बनावटी ही होगी असली नहीं हो सकती। सच्ची सुंदरता का बाहरी कलेवर से कोईसंबंध नहीं हैं। हम देखते हैं कि लोगों में दिनोंदिन मानवीय गुणों, परोपकार, दया आदि का भाव कम होता जा रहा है।

अभी कुछ दिन पहले की बात हैं। सड़क पर किसी व्यक्ति का बाइकदुर्घटनाग्रस्त हो गया था। वह व्यक्ति काफी देर तक तड़पता रहा और अंत में जिंदगी ने हार मान ली। लोग आते रहे, जाते रहे। किन्तु किसी ने भी रूककर उसकी मदद करने की नहीं सोची। अगर किसी ने उसकी सहायता की होती, तो उसकी जान बच सकती थी। यहां आंतरिक सुंदरता ने दम तोड़ दिया अर्थात् मनुष्यता और सामाजिकता का सौंदर्य लुप्त हो गया। यह मनुष्य जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं है। अस्तित्व को बनाए रखने के लिए बाह्यसुंदरता और आंतरिक सुंदरता, दोनों का होना परम आवश्यक है।

(श्री मुन्नी लाल, बरनवाल वैश्य सभा दिल्ली के संरक्षक हैं। वह लंबे समय तक संसद में हिन्दी अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे।)

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